आसमां से ज़मीन को छूता, मेरा फीका इन्द्रधनुष
गुमसुम सा रहता, कुछ न कहता, मेरा फीका इन्द्रधनुष
क्यों रूठे हो पूछा मैंने, मेरे प्यारे इन्द्रधनुष
आँख चुराके, खोया रहता, मेरा फीका इन्द्रधनुष
सागर से गहरा, अभिमान से ऊंचा, मेरा अनूठा इन्द्रधनुष
पर्वत से बहता छिछले नालों में, मेरा फीका इन्द्रधनुष
प्राण हो मेरे, आन हो मेरे रूठो न मुझसे इन्द्रधनुष,
रोज़ रोज़ की ताने सहता मेरा फीका इन्द्रधनुष
धूमिल से हो तुम, दूषित गलियों में खो न जाना इन्द्रधनुष,
भीड़ में जीता, शुन्य में खोया, नुक्कड़ पर बैठा इन्द्रधनुष
टूट चुका हूँ, जाग गया हूँ, कहाँ है मेरा इन्द्रधनुष?
सिसक सिसक के कोने में रोता, मेरा फीका इन्द्रधनुष
सदियों से जीता, पल-छिन्न में मरता, मेरा फीका इन्द्रधनुष,
मुझे देख कर, क्षण भर जी लो मेरे भोले इन्द्रधनुष,
आखिर थोडा सा, कुछ घबराया सा मिला मुझे वह इन्द्रधनुष
अपनी काया से, कुछ गदराया सा, मुझमें रंग है भरता...
मेरा फीका इन्द्रधनुष
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Sunday, May 10, 2009
Monday, November 24, 2008
Something I wrote - अदा
आपकी इक नज़र से न जाने कितने दिल पिघलते हैं,
आपके हुस्न के आगे लाखों आफ़ताब युहीं ढलते हैं,
आपकी मोहब्बत ने तो सिर्फ़ हमारी ज़िन्दगी बदली है,
आपकी अदाओं से ही तो यह मौसम बदलते हैं.
आपके हुस्न के आगे लाखों आफ़ताब युहीं ढलते हैं,
आपकी मोहब्बत ने तो सिर्फ़ हमारी ज़िन्दगी बदली है,
आपकी अदाओं से ही तो यह मौसम बदलते हैं.
Friday, March 16, 2007
committee
one of the old ones I'd written for some kavita competition at college. Its an old style kavita, the ones we hear at kavi sammelans (AABBCCDD). sounds better than it reads :-D
अब्दुल मिया कि मुर्गी के अंडे को रामू ने तोड़ दिया,
ग़ुस्से में आ, मिया ने रामू का सिर फोड़ दिया.
यह देख मोहल्ले में छिडी लदी,
पीटे गए दरजी लेखक :-) , या हो नाइ,
फैले दंगे शहर-शहर हर गली,
मार पीट के जनता ही आख़िर चढ़ी बलि
बात पहुची आख़िर में दिल्ली,
ठिठकी सर्कार मानो भीगी बिल्ली.
विरोधी दल ने आरोप लगाए
कहा "सरकार को तुरंत नीचे ले आयें"
लोकसभा में मचा घाना रोष,
विरोधिया का तर्क था कि केंद्र का दोष
सभे में लगे आरोप-प्रत्यारोप,
घेर लिया पम को मानो गोपियाँ और गोप
तोड़े गए मिकेस और मचाया हुड-दंग
आख़िर जीते पहलवान और कुच्छ एक भुजंग
नेताओं ने कहा "हड़ताल पर जायेंगे"
"बेबस तो है ही जनता, इनको बदहाल कराएँगे"
त ओबंद हुए नगर गाँव, गली मोहल्ले,
हुए कुच्छ दंगे, चली गोलियां खुल्लम खुल्ले
मिल गए सरे दुच्ष्ट कमीने, पाजी,
काटे गए दलित, पण्डे और काजी.
फालतू पत्रकारों का भी काम मिल गया,
विरोधी दल को भी कुच्छ आराम मिल गया
केंद्र पे टूट पडी यह नयी मुसीबत,
सिर पर आन् पडी एक और आफत
तो फिर चली पुराणी चाल और कि कमेटी सेतुप
लागे नाका-बंदी, बुलाये बच्कुप
केंद्र ने लुटाए रुपये सैकडो करोड़,
कमेटी ने भी कि मेहनत जी तोड़
आख़िर लगाए ७ महिने, २६ दिन
पेश कि गयी रिपोर्ट एक एक पन्ना गिन
रिपोर्ट के ५६० पन्नो का एक वाक्य में समावेश है,
८ महिनो कि खोज का निचोड़ यहाँ पेश है
"जनवरी में हुए जो दंगे, सौ बातों कि बात है -
इन दंगो के पीछे विदेशी ताक्तो का हाथ है"
अब्दुल मिया कि मुर्गी के अंडे को रामू ने तोड़ दिया,
ग़ुस्से में आ, मिया ने रामू का सिर फोड़ दिया.
यह देख मोहल्ले में छिडी लदी,
पीटे गए दरजी लेखक :-) , या हो नाइ,
फैले दंगे शहर-शहर हर गली,
मार पीट के जनता ही आख़िर चढ़ी बलि
बात पहुची आख़िर में दिल्ली,
ठिठकी सर्कार मानो भीगी बिल्ली.
विरोधी दल ने आरोप लगाए
कहा "सरकार को तुरंत नीचे ले आयें"
लोकसभा में मचा घाना रोष,
विरोधिया का तर्क था कि केंद्र का दोष
सभे में लगे आरोप-प्रत्यारोप,
घेर लिया पम को मानो गोपियाँ और गोप
तोड़े गए मिकेस और मचाया हुड-दंग
आख़िर जीते पहलवान और कुच्छ एक भुजंग
नेताओं ने कहा "हड़ताल पर जायेंगे"
"बेबस तो है ही जनता, इनको बदहाल कराएँगे"
त ओबंद हुए नगर गाँव, गली मोहल्ले,
हुए कुच्छ दंगे, चली गोलियां खुल्लम खुल्ले
मिल गए सरे दुच्ष्ट कमीने, पाजी,
काटे गए दलित, पण्डे और काजी.
फालतू पत्रकारों का भी काम मिल गया,
विरोधी दल को भी कुच्छ आराम मिल गया
केंद्र पे टूट पडी यह नयी मुसीबत,
सिर पर आन् पडी एक और आफत
तो फिर चली पुराणी चाल और कि कमेटी सेतुप
लागे नाका-बंदी, बुलाये बच्कुप
केंद्र ने लुटाए रुपये सैकडो करोड़,
कमेटी ने भी कि मेहनत जी तोड़
आख़िर लगाए ७ महिने, २६ दिन
पेश कि गयी रिपोर्ट एक एक पन्ना गिन
रिपोर्ट के ५६० पन्नो का एक वाक्य में समावेश है,
८ महिनो कि खोज का निचोड़ यहाँ पेश है
"जनवरी में हुए जो दंगे, सौ बातों कि बात है -
इन दंगो के पीछे विदेशी ताक्तो का हाथ है"
Tuesday, December 05, 2006
ek tute kalam ki syaahi
नही तोड़ सकूँगा नभ के तारे,
चांद के संग रहते वोह सारे,
ला नही सकता गगन ज़मीन पर,
क्या चांद का दिल मैं तोड़ सकूँगा?
क्या यादें तेरी छोड़ सकूँगा,
जाते लम्हे जोड़ सकूँगा?
जी ना सकूं तुम बिन शायद,
शायद एक पल, शायद एक दिन,
पर क्या तुम बिन जीवन छोड़ सकूँगा?
तुमको तनहा छोड़ सकूँगा?
क्या यादें तेरी छोड़ सकूँगा,
जाते लम्हे जोड़ सकूँगा?
तुम बिन मेरा क्या है जीवन?
बिन मंज़िल का राही,
एक टूटे कलम कि स्याही
क्या पन्ने कोरे छोड़ सकूँगा?
क्या यादें तेरी छोड़ सकूँगा,
जाते लम्हे जोड़ सकूँगा?
चांद के संग रहते वोह सारे,
ला नही सकता गगन ज़मीन पर,
क्या चांद का दिल मैं तोड़ सकूँगा?
क्या यादें तेरी छोड़ सकूँगा,
जाते लम्हे जोड़ सकूँगा?
जी ना सकूं तुम बिन शायद,
शायद एक पल, शायद एक दिन,
पर क्या तुम बिन जीवन छोड़ सकूँगा?
तुमको तनहा छोड़ सकूँगा?
क्या यादें तेरी छोड़ सकूँगा,
जाते लम्हे जोड़ सकूँगा?
तुम बिन मेरा क्या है जीवन?
बिन मंज़िल का राही,
एक टूटे कलम कि स्याही
क्या पन्ने कोरे छोड़ सकूँगा?
क्या यादें तेरी छोड़ सकूँगा,
जाते लम्हे जोड़ सकूँगा?
Monday, November 27, 2006
A political satire on re-elections
गिर पडी सरकार
गिर पडी सत्ता और एक बार,
जनता के मत्थे मधेगी एक नयी सरकार
फिर आया नेताओं का बहाव
देश में केवल इनका नही है आभाव
नज़र आये सारे लल्लू एक अर्से के बाद
सब मिल आये हैं करने देश को बर्बाद
बडे और झूठे आश्वाशन अब भी हैं
पिच्च्ले वादे पुरे नही हुए तो क्या?
वादों में टेल और राशन अब भी हैं
जनता पिच्च्ली बार सो गयी तो क्या?
लंबे-लंबे भाषण अब भी हैं
पाण्डवों का युग गया तो क्या?
खेमे में शकुनी और दुश्शाशन अब भी हैं.
निकलेंगी फिर से रैल्लियाँ, मंडराएँगे चमचे
उतर आएंगे धुरंदर नीचे, मांगेंगे वोट हमसे
चुनाव चिनंह लक्ष्मी और उनका वाहन नेता है
राजनीती के खेल में जनता मूक दर्शक, लीडर निर्देशक, कैशिएर, अभिनेता है
सोचता हूँ इस बार वोट मैं भी दाल दूं
रैली में बात ते नोट कुच्छ मई भी संभाल लूं
और अगर राजनीती नही होती तो देश के नित्ठालों का क्या होता?
पासवान चबाता खैनी नुक्कड़ पर, लालू तबेले में लगा होता
फिर भी नेता तो आख़िर नेता है, वोह भी खुदा का एक बन्दा है
आख़िर तो भी बेचारा क्या करे, यही तो उसका धंदा है.
गिर पडी सत्ता और एक बार,
जनता के मत्थे मधेगी एक नयी सरकार
फिर आया नेताओं का बहाव
देश में केवल इनका नही है आभाव
नज़र आये सारे लल्लू एक अर्से के बाद
सब मिल आये हैं करने देश को बर्बाद
बडे और झूठे आश्वाशन अब भी हैं
पिच्च्ले वादे पुरे नही हुए तो क्या?
वादों में टेल और राशन अब भी हैं
जनता पिच्च्ली बार सो गयी तो क्या?
लंबे-लंबे भाषण अब भी हैं
पाण्डवों का युग गया तो क्या?
खेमे में शकुनी और दुश्शाशन अब भी हैं.
निकलेंगी फिर से रैल्लियाँ, मंडराएँगे चमचे
उतर आएंगे धुरंदर नीचे, मांगेंगे वोट हमसे
चुनाव चिनंह लक्ष्मी और उनका वाहन नेता है
राजनीती के खेल में जनता मूक दर्शक, लीडर निर्देशक, कैशिएर, अभिनेता है
सोचता हूँ इस बार वोट मैं भी दाल दूं
रैली में बात ते नोट कुच्छ मई भी संभाल लूं
और अगर राजनीती नही होती तो देश के नित्ठालों का क्या होता?
पासवान चबाता खैनी नुक्कड़ पर, लालू तबेले में लगा होता
फिर भी नेता तो आख़िर नेता है, वोह भी खुदा का एक बन्दा है
आख़िर तो भी बेचारा क्या करे, यही तो उसका धंदा है.
Saturday, October 14, 2006
Inspired by listening to old nostalgic Ghazal records
फुर्सत के दिन
वोह गरजते पानी के छींटे
वोह कीचड में सने दिन
वोह छोटी कागज कि कश्तियां
वोह हर पल डूबता सूरज, पूरब से पश्छिम
वोह सर्द हवाओं के झोंकय
वोह दोस्तो कि किलकारियाँ
वोह गिरकर उठकर भागना,
वोह माँ का डांटना हर दिन
मुट्ठी में रेत सा खिसकता वक़्त
काश! तभी ठहर जाता
काश! कुच्छ रेत मई अपनी जेब में भर पाता
रूक जता शायद वोह समय वोह पल-छीन
पलट कर देखता हूँ मैं
पर शायद कई मोड़ गुज़र चुके हैं तब से अब तक
ढूँढता हूँ फिर भी मैं उन्हें,
जाने कहाँ गए वोह फुर्सत के दिन
वोह गरजते पानी के छींटे
वोह कीचड में सने दिन
वोह छोटी कागज कि कश्तियां
वोह हर पल डूबता सूरज, पूरब से पश्छिम
वोह सर्द हवाओं के झोंकय
वोह दोस्तो कि किलकारियाँ
वोह गिरकर उठकर भागना,
वोह माँ का डांटना हर दिन
मुट्ठी में रेत सा खिसकता वक़्त
काश! तभी ठहर जाता
काश! कुच्छ रेत मई अपनी जेब में भर पाता
रूक जता शायद वोह समय वोह पल-छीन
पलट कर देखता हूँ मैं
पर शायद कई मोड़ गुज़र चुके हैं तब से अब तक
ढूँढता हूँ फिर भी मैं उन्हें,
जाने कहाँ गए वोह फुर्सत के दिन
Thursday, June 01, 2006
kyon apna ho kar bhi begana sa lagta hai ab mera yeh desh?
kyon nahi bhaati ab mujhe woh pehli barsaat ki khusboo
kyon nahi bharta hai gaurav mujhmein ab woh rashtra-geet ka sandesh
kyon ab lagta hai ab mit jayega mera astitva ya jo kuchch hai ab shesh
kyon apna ho kar bhi begana sa lagta hai ab mera yeh desh?
manzilein kabhi thi raston ke dooje chhor pe,
manzilein ab bhi wahin hain, badla hai bas rasto ke bhesh
beech mein ab hai ik khaai, dono taraf ab eershya aur klesh
kyon apna ho kar bhi begana sa lagta hai ab mera yeh desh?
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